Thursday, December 7, 2017

राम होंगे मंदिर में विराजमान

राम की महिमा जिसने भी गाई वो इस भव से तर गया
रावण  जैसा  महाज्ञानी  भी  राम  के  हाथ से मर गया।

राम नाम को कोई इस जग में अब तक हरा नही पाया
सबको हर मुसीबत में बस राम नाम ही तो याद आया।

अंत समय  राम  नाम  साथ  जाएगा वो ही स्वीकार है
राम  मान  सत्य  है  राम  नाम  की महिमा अपरंपार है ।

इस दुनिया  में  जिसने हम को मर्यादा का पाठ पड़ाया
भरत ,लखन जैसा भाई भाई का प्यार हमको सिखाया ।

अयोध्या  करती  है पुकार  बने राम का मंदिर इस बार
चढ़े ध्वजा , हो पूजा आरती , चढ़े फूल माला का हार ।

आज  नही  तो  कल होगा जैसा सोचा वैसा हल होगा
अब  राम होंगे मंदिर में विराजमान  वो अब पल होगा।

मोहित

Monday, December 4, 2017

तुम ही मेरी जिंदगी तुम ही मेरा प्यार हो

तुम ही मेरी जिंदगी तुम ही मेरा प्यार हो ।
तुम से बना हूँ में , तुम ही मेरा संसार हो।
तुम्हारे  लिए  सपनें  मेरे  कही  हजार है,
उन सपनों में तुम मेरे लिए कही हजार हो।

में यहाँ बहता पानी हूँ जिसकी तुम धार हो।
इस बीच नदी की तुम आज मेरी पतवार हो।
तुम्हारी  दोस्ती  ही  मेरा  सच्चा  जीवन  है,
तुम जैसे हो, वैसे ही मुझे ,अब स्वीकार हो ।
मोहित

तुम्हारा ही अहसास लिखूंगा

मिलों तुम तो तुम्हारा ही अहसास लिखूंगा ।
बिन  देखे तुम्हें में खुद को उदास लिखूंगा ।
तुम्हें  देख  कर  ही  में ये जीवन जी पाया,
कभी दूर चले जाहो दिल के पास लिखूंगा ।
मोहित

Thursday, November 23, 2017

में हर दिन याद करूँगा

में  तुम्हारी  हर याद को नमन करता हूँ।
गुज़रे हुए कल को आज वंदन करता हूँ।
में आस्था,श्रद्धा और सुमन के फूल आज
में  तुम्हारी  चरणों  में  अर्पण  करता हूँ।
मोहित

में  गुजरें  हुए  कल  की याद करता हूँ ।
कल की याद में अब फरियाद करता हूँ।
हर दिन गुजरा हुआ पल याद आता है,
बीती  याद  से  आज  सवांद  करता हूँ।
मोहित

पद्मावती

हमारी  संस्क्रति  को  यूँ  नही  आज  बदनाम होने देंगे ।
हम  पद्मावती  की  अस्मत  को  नही नीलाम होने देंगे ।
हम भी भूगोल बदल देंगे अगर अब इतिहास बदला तो
मगर  झूठे  इतिहास  का  आज  नही  बखान  होने देंगे ।।
मोहित

मुक्तक मानुषी


भारत   की   बेटिया  संसार   में   मान   बड़ाती   है ।
हर  प्रतियोगिता   में   भाग   लेने  वो  जो  जाती  है।
जग  की  सारी सुंदरियों  को  पछाड़  कर भारत की ,
मानुषी छिल्लर मिस वर्ल्ड का ख़िताब जीत आती है।

गजल


ना जानें किस आग में वो जल रही थी
मोहब्बत  के सफर में वो चल रही थी ।
कोई  नही  था  उसको  पालने  वाला
जानें किस के दम पर आज पल रही थी।
वो अपनी मंजिल की और बड़ रही थी,
लोंगो को ये बात भी क्यों खल रही थी।
आदि नही ,अनादि रौशनी की किरण थी
आज अपने सफर की और डल रही थी।
जग के सामने कभी झुकने नही दिया
और को मजबूत किया खुद गल रही थी।।
मोहित